Friday, 10 July 2015

पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में रिश्ते मिलते हैं।

पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में रिश्ते मिलते हैं। संतान के रूप में हमारा कोई पूर्व जन्म का 'संबंधी' ही आकर जन्म लेता है जिसे शास्त्रों में 4 प्रकार का बताया गया है-
1. ऋणानुबंध : पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो तो वो आपके घर में संतान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक कि उसका हिसाब पूरा न हो।
2. शत्रु पुत्र : पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिए आपके घर में संतान बनकर आएगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिंदगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा।
3. उदासीन पुत्र : इस प्रकार की संतान न तो माता-पिता की सेवा करती है और न ही कोई सुख देती है और उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है। विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाती है। यह पूर्व जन्म का पड़ोसी हो सकता है।
4. सेवक पुत्र : पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए, आपकी सेवा करने के लिए पुत्र बनकर आता है। अगर आपने किसी गाय की निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह पुत्री बनकर आ सकती है।
यदि आपने गाय को स्वार्थवश पालकर उसके दूध देना बंद करने के पश्चात उसे घर से निकाल दिया हो तो वह ऋणानुबंध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आएगा इसलिए जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं करना चाहिए।
प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करते हैं, उसे वह अगले जन्म में 100 गुना करके देती है। यदि आपने किसी को 1 रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में 100 रुपए जमा हो गए हैं। यदि आपने किसी का 1 रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से 100 रुपए निकल गए।

Tuesday, 9 June 2015

कथाएं, वास्तुशास्त्र, शास्त्रों, संस्कारित, हिंदू धर्म,

झाड़ू-पोंछा करने से घर साफ और स्वच्छ रहता है। साथ ही, इनसे जुड़ी कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है। शास्त्रों के अनुसार झाड़ू को भी महालक्ष्मी का ही एक स्वरूप माना गया है। झाड़ू से दरिद्रता रूपी गंदगी को बाहर किया जाता है। जिन घरों के कोने-कोने में भी सफाई रहती है, वहां का वातावरण सकारात्मक रहता है। घर के कई वास्तु दोष भी दूर होते हैं। यहां जानिए झाड़ू और पोंछा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए...
झाड़ू कहां और कैसे रखें
झाड़ू से घर में प्रवेश करने वाली बुरी अथवा नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। अत: इसके संबंध ध्यान रखें कि...
1. खुले स्थान पर झाड़ू रखना अपशकुन माना जाता है, इसलिए इसे छिपा कर रखें।
2. भोजन कक्ष में झाड़ू न रखें, क्योंकि इससे घर का अनाज जल्दी खत्म हो सकता है। साथ ही, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
3. यदि अपने घर के बाहर हर रोज रात के समय दरवाजे के सामने झाड़ू रखते हैं तो इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती है। ये काम केवल रात के समय ही करना चाहिए। दिन में झाड़ू छिपा कर रखें।
घर में पोंछा लगाते समय करें ये उपाय
जब भी घर में पोंछा लगाते है, तब पानी में थोड़ा-सा नमक भी मिला लेना चाहिए। नमक मिले हुए पानी से पोंछा लगाने पर फर्श के सूक्ष्म कीटाणु नष्ट होंगे। साथ ही, घर की नकारात्मक ऊर्जा भी खत्म हो जाएगी।
झाड़ू से जुड़े शकुन-अपशकुन
1. अगर कोई बच्चा घर में अचानक झाड़ू लगा रहा है तो समझना चाहिए अनचाहे मेहमान घर में आने वाले हैं।
2. सूर्यास्त के बाद घर में झाड़ू पोंछा गलती से भी नहीं लगाना चाहिए। ऐसा करना अपशकुन माना जाता है।
3. झाड़ू पर गलती से भी पैर नहीं रखना चाहिए। ऐसा होने पर लक्ष्मी रूठ जाती हैं। यह अपशकुन है।
पोंछा से जुड़ी खास बातें
1. घर में नियमित रूप से पोछा लगाने से आपके घर में लक्ष्मी का निवास होने लग जाता है।
2. पुरानी मान्यता है कि गुरुवार को घर मेंं पोछा न लगाएं ऐसा करने से लक्ष्मी रूठ जाती है। शेष सभी दिनों में पोंछा लगाना चाहिए।
3. पोंछा लगाने वाले पानी में पांच चम्मच सादा समुद्री नमक मिलाने से सकारात्मक असर जल्दी होता है। इससे नकारात्मक ऊर्जा को कम किया जा सकता है।
झाड़ू से जुड़े कुछ और शकुन-अपशकुन
1. कभी भी गाय या अन्य जानवर को झाड़ू से नहीं मारना चाहिए। यह अपशकुन माना गया है।
2. कोई भी सदस्य किसी खास कार्य के लिए घर से निकला हो तो उसके जाने के तुरंत बाद घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए। ऐसा करने पर उस व्यक्ति को असफलता का सामना करना पड़ सकता है।
3. झाड़ू को कभी भी खड़ी करके नहीं रखना चाहिए। यह अपशकुन माना गया है।
4. हम जब भी किसी नए घर में प्रवेश करें, उस समय नई झाड़ू लेकर ही घर के अंदर जाना चाहिए। यह शुभ शकुन माना जाता है। इससे नए घर में सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहेगी।
5. हमेशा ध्यान रखें कि ठीक सूर्यास्त के समय झाड़ू नहीं निकालना चाहिए। यह अपशकुन है।
महालक्ष्मी की कृपा पाने के लिए करें ये उपाय
देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए घर के आसपास किसी भी मंदिर में तीन झाड़ू रख आएं। यह पुराने समय से चली आ रही परंपरा है। पुराने समय में लोग अक्सर मंदिरों में झाड़ू दान किया करते थे।
ध्यान रखें ये बातें-
- मंदिर में झाड़ू सुबह ब्रह्म मुहूर्त में रखना चाहिए।
- यह काम किसी विशेष दिन करना चाहिए। विशेष दिन जैसे कोई त्योहार, ज्योतिष के शुभ योग या शुक्रवार को।
- इस काम को बिना किसी को बताए गुप्त रूप से करना चाहिए। शास्त्रों में गुप्त दान का विशेष महत्व बताया गया है।
- जिस दिन यह काम करना हो, उसके एक दिन पहले ही बाजार से 3 झाड़ू खरीदकर ले आना चाहिए।

कथाएं, वास्तुशास्त्र, शास्त्रों, संस्कारित, हिंदू धर्म,

रविवार, मंगलवार और गुरुवार को नमक नहीं खाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है और हर कार्य में बाधा आती है।
यद‍ि मंगलवार को कार्य में बाधा आती हो तो हनुमानजी का सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाकर या नया चोला चढ़ाएं।
बुधवार को माता को सिर नहीं धोना चाहिए ऐसा करने से बच्चे का स्वास्थ्य बिगड़ता है या उसके समक्ष कोई कष्ट आता है।
मंगलवार को किसी को ऋण नहीं देना चाहिए वर्ना दिया गया ऋण आसानी से मिलने वाला नहीं है। मंगलवार को ऋण चुकता करने का अच्छा दिन माना गया है। इस दिन ऋण चुकता करने से फिर कभी ऋण लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
बुधवार को धन का लेन-देन नहीं करना चाहिए बल्की धन को जमा करना चाहिए। इस दिन जमा किए गए धन में बरकत रहती है।
किसी कार्य में बाधा आ रही हो तो बुधवार को उत्पन्न सन्तान से कार्य कराएं तो बन जाएगा।
लड़के को शनिवार के दिन ससुराल नहीं भेजना चाहिए। शनिवार के दिन तेल, लकड़ी, कोयला, नमक, लोहा या लोहे की वस्तु क्रय करके नहीं लानी चाहिए वर्ना बिना बात की बाधा उत्पन्न होगी और अचानक कष्ट झेलना पड़ेगा।
गुरुवार को शेविंग न करें वर्ना संतान सुख में बाधा उत्पन्न होगी।

कथाएं, नियम, पुराणों, मणि, वास्तु, विज्ञान,

मणि एक प्रकार का चमकता हुआ पत्थर होता है। मणि को हीरे की श्रेणी में रखा जा सकता है। मणि होती थी यह भी अपने आप में एक रहस्य है। जिसके भी पास मणि होती थी वह कुछ भी कर सकता था। ज्ञात हो कि अश्वत्थामा के पास मणि थी जिसके बल पर वह शक्तिशाली और अमर हो गया था। रावण ने कुबेर से चंद्रकांत नाम की मणि छीन ली थी।
मान्यता है कि मणियां कई प्रकार की होती थीं। अगले पन्नों पर हम बताएंगे कि कौन-कौन-सी मणियां होती हैं।
मणियों के महत्व के कारण ही तो भारत के एक राज्य का नाम मणिपुर है। शरीर में स्थित 7चक्रों में से एक मणिपुर चक्र भी होता है। मणि से संबंधित कई कहानी और कथाएं समाज में प्रचलित हैं। इसके अलावा पौराणिक ग्रंथों में भी ‍मणि के किस्से भरे पड़े हैं।
मणियों को सामान्य हीरे से कहीं ज्यादा मूल्यवान माना जाता है। जैनियों में मणिभद्र नाम से एक महापुरुष हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि चिंतामणि को स्वयं ब्रह्माजी धारण करते हैं। रुद्रमणि को भगवान शंकर धारण करते हैं। कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। इसी तरह और भी कई मणियां हैं जिनके चमत्कारों का उल्लेख पुराणों में है। आओ जानते हैं प्रमुख 10 मणियों के बारे में।
पारस मणि : पारस मणि का जिक्र पौराणिक और लोक कथाओं में खूब मिलता है। इसके हजारों किस्से और कहानियां समाज में प्रचलित हैं। कई लोग यह दावा भी करते हैं कि हमने पारस मणि देखी है। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में जहां हीरे की खदान है, वहां से 70 किलोमीटर दूर दनवारा गांव के एक कुएं में रात को रोशनी दिखाई देती है। लोगों का मानना है कि कुएं में पारस मणि है।
पारस मणि की प्रसिद्धि और लोगों में इसके होने को लेकर इतना विश्‍वास है कि भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो पारस के नाम से जाने जाते हैं। कुछ लोगों के आज भी पारस नाम होते हैं।
पारस मणि की खासियत : पारस मणि से लोहे की किसी भी चीज को छुआ देने से वह सोने की बन जाती थी। इससे लोहा काटा भी जा सकता है। कहते हैं कि कौवों को इसकी पहचान होती है और यह हिमालय के आस-पास ही पाई जाती है। हिमालय के साधु-संत ही जानते हैं कि पारस मणि को कैसे ढूंढा जाए, क्योंकि वे यह जानते हैं कि कैसे कौवे को ढूंढने के लिए मजबूर किया जाए।
नीलमणि : नीलमणि एक रहस्यमय मणि है। असली नीलमणि जिसके भी पास होती है उसे जीवन में भूमि, भवन, वाहन और राजपद का सुख होता है। इसे 'नीलम' भी कहा जाता है। लेकिन शनि का रत्न नीलम और नीलमणि में फर्क है। संस्कृत में नीलम को इन्द्रनील, तृषाग्रही नीलमणि भी कहा जाता है।
असली नीलमणि या नीलम से नीली या बैंगनी रोशनी निकली है, जो दूर तक फैल जाती है। विश्व का सबसे बड़ा नीलम 888 कैरेट का श्रीलंका में है जिसकी कीमत करीब 14 करोड़ आंकी गई है।
नीलम के प्रकार- 1. जलनील, 2. इन्द्रनील।
भारत में नीलमणि पर्वत भी है। भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य में नीलम पाया जाता है। कश्मीर में पहले नागवंशियों का राज था। नीलम विशुद्ध रंग मोर की गर्दन के रंग का होता है। कहते हैं कि नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में असली 'नीलमणि' रखी हुई है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है कि नीलम का लाभ होता है या नहीं, यह दावे से नहीं कहा जा सकता।
नागमणि : नागमणि को भगवान शेषनाग धारण करते हैं। भारतीय पौराणिक और लोक कथाओं में नागमणि के किस्से आम लोगों के बीच प्रचलित हैं। नागमणि सिर्फ नागों के पास ही होती है। नाग इसे अपने पास इसलिए रखते हैं ताकि उसकी रोशनी के आसपास इकट्ठे हो गए कीड़े-मकोड़ों को वह खाता रहे। हालांकि इसके अलावा भी नागों द्वारा मणि को रखने के और भी कारण हैं।
नागमणि का रहस्य आज भी अनसुलझा हुआ है। आम जनता में यह बात प्रचलित है कि कई लोगों ने ऐसे नाग देखे हैं जिसके सिर पर मणि थी। हालांकि पुराणों में मणिधर नाग के कई किस्से हैं। भगवान कृष्ण का भी इसी तरह के एक नाग से सामना हुआ था।
छत्तीसगढ़ी साहित्य और लोककथाओं में नाग, नागमणि और नागकन्या की कथाएं मिलती हैं। मनुज नागमणि के माध्यम से जल में उतरते हैं। नागमणि की यह विशेषता है कि जल उसे मार्ग देता है। इसके बाद साहसी मनुज महल में प्रस्थित होकर नाग को परास्त कर नागकन्या प्राप्त करता है।
नागमणि के चमत्कार : नागमणि के बारे में कहा जाता है कि यह जिसके भी पास होती है उसकी किस्मत बदल जाती है। कहते हैं कि नागमणि में अलौकिक शक्तियां होती हैं। उसकी चमक के आगे हीरा भी फीका पड़ जाता है। मान्यता अनुसार नागमणि जिसके भी पास होती है उसमें भी अलौकिक शक्तियां आ जाती हैं और वह आदमी भी दौलतमंद हो जाता है। मणि का होना उसी तरह है जिस तरह की अलादीन के चिराग का होना। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह कोई नहीं जानता।
कौस्तुभ मणि : कौस्तुभ मणि को भगवान विष्णु धारण करते हैं। कौस्तुभ मणि की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। पुराणों के अनुसार यह मणि समुद्र मंथन के समय प्राप्त 14 मूल्यवान रत्नों में से एक थी। यह बहुत ही कांतिमान मणि है।
यह मणि जहां भी होती है, वहां किसी भी प्रकार की दैवीय आपदा नहीं होती। यह मणि हर तरह के संकटों से रक्षा करती है। माना जाता है कि समुद्र के तल या पाताल में आज भी यह मणि पाई जाती है।
चंद्रकांता मणि : भारत में चंद्रकांता मणि के नाम पर अब उसका उपरत्न ही मिलता है। इस मणि को धारण करने से भाग्य में वृद्धि होती है। किसी भी प्रकार की गंभीर दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। इससे वैवाहिक जीवन भी सुखमय व्यतीत होता है। चंद्रकांता मणि का उपरत्न पारदर्शी जल की तरह साफ-सुथरा होता है। यह चंद्रमा से संबंधित रत्न होता है।
माना जाता है कि असली चंद्रकांता मणि जिसके भी पास होती है उसका जीवन किसी चमत्कार की तरह पलट जाता है। कहने का मतलब उसका भाग्य अचानक बदल जाता है। इस मणि की तरह ही उसका जीवन में चमकने लगता है। उसकी हर तरह की इच्‍छाएं पूर्ण होने लगती हैं।
कहते हैं कि झारखंड के बैजनाथ मंदिर में चंद्रकांता मणि है। धनकुबेर की राजधानी अलकापुरी से राक्षसराज रावण द्वारा यहां पर यह मणि जड़ित की गई थी।
शुश्रुत संहिता में चन्द्र किरणों का उपचार के रूप में उल्लेख मिलता है जिनमें प्रमुख है अद्भुत चंद्रकांत मणि का उल्लेख। इस मणि की एक प्रमुख विशेषता होती है कि इसे चन्द्र किरणों की उपस्थति में रखने पर इससे जल टपकने लगता है। इस जल में कई अद्भुत औषधीय गुण होते हैं।
रक्षोघ्नं शीतलं हादि जारदाहबिषापहम्।
चन्द्रकान्तोद्भवम् वारि वित्तघ्नं विमलं स्मृतम्।। सुश्रुत 45/27।।
अर्थात चन्द्रकांता मणि से उत्पन्न जल कीटाणुओं का नाश करने वाला है। शीतल, आह्लाददायक, ज्वरनाशक, दाह और विष को शांत करने वाला है।
स्यमंतक मणि : स्यमंतक मणि को इंद्रदेव धारण करते हैं। कहते हैं कि प्राचीनकाल में कोहिनूर को ही स्यमंतक मणि कहा जाता था। कई स्रोतों के अनुसार कोहिनूर हीरा लगभग 5,000 वर्ष पहले मिला था और यह प्राचीन संस्कृत इतिहास में लिखे अनुसार स्यमंतक मणि नाम से प्रसिद्ध रहा था। दुनिया के सभी हीरों का राजा है कोहिनूर हीरा। यह बहुत काल तक भारत के क्षत्रिय शासकों के पास रहा फिर यह मुगलों के हाथ लगा। इसके बाद अंग्रेजों ने इसे हासिल किया और अब यह हीरा ब्रिटेन के म्यूजियम में रखा है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है कि कोहिनूर हीरा ही स्यमंतक मणि है? यह शोध का विषय हो सकता है। यह एक चमत्कारिक मणि है।
भगवान श्रीकृष्ण को इस मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी।
सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रखी ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंतजी ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।
तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंतजी से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने रामस्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।
जाम्बवती-कृष्ण के संयोग से महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम साम्ब रखा गया। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था। श्रीकृष्ण ने कहा कि कोई ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति ही इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी है अत: श्रीकृष्ण ने वह मणि अक्रूरजी को दे दी। उन्होंने कहा कि अक्रूर, इसे तुम ही अपने पास रखो। तुम जैसे पूर्ण संयमी के पास रहने में ही इस दिव्य मणि की शोभा है। श्रीकृष्ण की विनम्रता देखकर अक्रूर नतमस्तक हो उठे।
स्फटिक मणि : स्फटिक मणि सफेद रंग की चमकदार होती है। यह आसानी से मिल जाती है। फिर भी इसके असली होने की जांच कर ली जानी चाहिए।
स्फटिक मणि की अंगूठी भी होती है। अधिकतर लोग स्फटिक की माला धारण करते हैं। हालांकि स्फटिक को धारण करने के अपने कुछ खास नियम होते हैं अन्यथा यह नुकसानदायक भी सिद्ध हो सकता है।
इसको धारण करने से सुख, शांति, धैर्य, धन, संपत्ति, रूप, बल, वीर्य, यश, तेज व बुद्धि की प्राप्ति होती है तथा इसकी माला पर किसी मंत्र को जप करने से वह मंत्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है। स्फटिक मणि के कई चमत्कारों का वर्णन ज्योतिषियों के ग्रंथों में मिलता है।
लाजावर्त मणि : इस मणि का रंग मयूर की गर्दन की भांति नील-श्याम वर्ण के स्वर्णिम छींटों से युक्त होता है। यह मणि भी प्राय: कम ही पाई जाती है।
लाजावर्त मणि को धारण करने से बल, बुद्धि एवं यश की वृद्धि होती ही है। माना जाता है कि इसे विधिवत रूप से मंगलवार के दिन धारण करने से भूत, प्रेत, पिशाच, दैत्य, सर्प आदि का भी भय नहीं रहता।
उलूक मणि : उलूक मणि के बारे में ऐसी कहावत है कि यह मणि उल्लू पक्षी के घोंसले में पाई जाती है। हालांकि अभी तक इसे किसी ने देखा नहीं है। माना जाता है कि इसका रंग मटमैला होता है।
यह किंवदंती है कि किसी अंधे व्यक्ति को यदि घोर अंधकार में ले जाकर द्वीप प्रज्वलित कर उसकी आंख से इस मणि को लगा दें तो उसे दिखाई देने लगता है। दरअसल यह नेत्र ज्योति बढ़ाने में लाभदायक है।
प्रमुख मणियां 9 मानी जाती हैं- घृत मणि, तैल मणि, भीष्मक मणि, उपलक मणि, स्फटिक मणि, पारस मणि, उलूक मणि, लाजावर्त मणि, मासर मणि।
* घृत मणि की माला धारण कराने से बच्चों को नजर से बचाया जा सकता है।
* इस मणि को धारण करने से कभी भी लक्ष्‍मी नहीं रूठती।
* तैल मणि को धारण करने से बल-पौरूष की वृद्धि होती है।
* भीष्मक मणि धन-धान्य वृद्धि में सहायक है।
* उपलक मणि को धारण करने वाला व्यक्ति भक्ति व योग को प्राप्त करता है।
* उलूक मणि को धारण करने से नेत्र रोग दूर हो जाते हैं।
* लाजावर्त मणि को धारण करने से बुद्धि में वृद्धि होती है।
* मासर मणि को धारण करने से पानी और अग्नि का प्रभाव कम होता है।

आसमान, परेशानी, मंदिरों, मानसिक रोग, वास्तुशास्त्र, शादी, शास्त्रों,

भगवान भोलेनाथ सहज ही प्रसन्न होने वाले देव हैं। केवल मात्र जल का लोटा अर्पण करने से ही महादेव प्रसन्न होकर भक्त को मनचाहा वरदान दे देते हैं। फिर भी भगवान नीलकंठ की पूजा में कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें यथासंभव नहीं करना चाहिए अन्यथा साधक का भाग्य रूठ जाता है।�
भगवान शिव को तुलसी कभी नहीं चढ़ाए। शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की पत्नी माना गया है। अत: यह विष्णुजी तथा उनके अवतारों के अलावा अन्य किसी देवता को अर्पित नहीं की जाती।
घर में एक साथ दो शिवलिंग की स्थापना न करें। इसी तरह दो गणेश प्रतिमा और तीन दुर्गाओं की प्रतिष्ठा न कराएं। इससे दुर्भाग्य सदा के लिए घर में बसेरा कर लेता है।
शिव की पूजा में बिल्वपत्र का विशेष महत्व है। पूजा करते समय जो भी बिल्वपत्र काम में लिए जाएं वे कटे-फटे नहीं होने चाहिए और कीड़ों के खाए हुए होने चाहिए। इसके बजाय यदि पहले से भगवान शिव पर बिल्वपत्र चढ़ाए हुए हो तो उन्हीं को फिर से जल से धोकर अर्पण करना चाहिए।
पूजा के समय दूध, दही तथा पंचामृत को कभी भी कांसे के बर्तन में नहीं रखना चाहिए। ऎसा करने से पूजा में भारी दोष लगता है।
भगवान शिव को धतूरा तथा विजया (भांग) बहुत पसंद है। पूजा करते समय भगवान को यथासंभव दोनों ही अर्पण करना चाहिए।�
भगवान शिव की पूजा घर, मंदिर अथवा श्मशान में कहीं भी की जा सकती है परन्तु प्रत्येक स्थान के लिए अलग-अलग भेदों से पूजा की जाती है। अत: शिव की पूजा के वल मात्र घर अथवा किसी मंदिर में ही करें।

Astrology tips

कोई भी व्यक्ति किस तरह की नौकरी या व्यापार करेगा इसका निर्णय उसकी जन्मकुंडली देख कर सहज ही किया जा सकता है। जन्मकुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें घर को देख कर व्यक्ति के कॅरियर को जाना जा सकता है। यदि इन जगहों पर कोई अशुभ ग्रह बैठा हुआ है या किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि इन घरों पर पड़ रही है तो भी व्यक्ति जीवन में तरक्की नहीं कर पाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार किसी भी व्यक्ति को तभी सरकारी नौकरी मिल सकती है जबकि उसकी कुंडली में निम्न में से कोई एक योग हो:
(1) दसवें घर में किसी शुभ ग्रह की मौजूदगी हो
(2) दसवें घर में सूर्य तथा मंगल एक साथ विराजमान हो
(3) कुंडली के पहले घर (लग्न) अथवा पांचवे घर में राहू हो, साथ ही वह दसवें घर के स्वामी ग्रह से शुभ युति बना रहा हो
(4) कुंडली के पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों की उपस्थिति हो
(5) यदि इनमें से कोई भी एक योग जन्मकुंडली में न होकर नवमांश कुंडली में हो तो आपकी सरकारी नौकरी नहीं लगेगी वरन आपके लाइफ-पार्टनर की सरकारी नौकरी जरूर होगी।
यदि आपकी कुंडली में शुभ योग नहीं है तो भी आप सरकारी नौकरी पा सकते हैं। इसके लिए आपको ज्योतिष के साधारण से उपाय करने होंगे जिसके बाद आपकी कुंडली के ग्रह आपके अनुकूल हो जाते हैं और सरकारी नौकरी या वर्तमान नौकरी में तरक्की का मार्ग खोल देते हैं। आइए जानते हैं क्या हैं ये उपाय:
किसी भी व्यक्ति की सरकारी नौकरी के पीछे तीन मुख्य ग्रह माने जाते हैं, ये हैं सूर्य, गुरू और शनि। इनकी अनुकूलता मिलने पर व्यक्ति गजेटेड ऑफिसर या आईएएस ऑफिसर बनता है। इन्हें निम्न उपायों से आप अपने अनुकूल बना सकते हैं।
सूर्य राजयोग बनाने वाला ग्रह है। सूर्य की प्रसन्नता के न केवल अच्छी नौकरी मिलती है वरन जीवन भी खुशहाल हो जाता है। सूर्य को अनुकूल करने के लिए सबसे बेहतर है प्रतिदिन आदित्यह्रदयस्त्रोत का पाठ करें तथा सुबह सुबह जल्दी नहा-धोकर सूर्य को जल अर्पण करें। इससे जीवन की अन्य समस्याएं भी समाप्त होती हैं।
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गुरू एक सौम्य ग्रह होने के साथ साथ जीवन संचालित करने वाला ग्रह है। गुरू की अनुकूलता आदमी को राजा बना देती है। गुरू को अनुकूल करने के लिए पीली वस्तुओं का दान करना, भगवान विष्णु या कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। इससे गुरू आपके अनुकूल होकर मनचाहे फल देने लगता है।
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शनि एकमात्र ग्रह है जो अगर आपको आसमान पर ले जा सकता है तो प्रतिकूल होने पर पाताल की गहराईयां भी दिखा सकता है। शनि को अनुकूल करने के लिए नीलम पहनना चाहिए तथा शनिवार को कुछ न कुछ अवश्य दान करना चाहिए। शनि नौकरी देने वाला ग्रह भी माना जाता है। शनि की अनुकूलता आपकी सरकारी नौकरी का मार्ग खोलती है।

Hindu dharm me daan ka mahatwa

हिंदू धर्म में दान देने का बहुत महात्म्य बताया गया है। चीटियों, पक्षी-पशुओं, बालकों तथा भिखारियों को दान देने से भी जीवन में अनुकूलता मिलती है। यदि आपके पास नौकरी नहीं है और आप नौकरी के लिए परेशान हो रहे हैं तो आपको अपने वजन के बराबर का अनाज किसी विष्णु मंदिर अथवा निर्धन व्यक्ति को दान देना चाहिए।
जो लोग किसी कारणवश दान नहीं दे सकते या इन उपायों को करने में समर्थ नहीं हैं उन्हें अपने संकट दूर करने के लिए सूर्य के मंत्र ओम घृणि सूर्याय नम: का प्रतिदिन सुबह 108 बार जाप करें। जाप के बाद भगवान सूर्य से अनुकूल नौकरी देने की मनोकामना कहें। आपकी इच्छा पूरी होगी।
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इसके अतिरिक्त भी शिव मंदिर में जाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से भी बुरे ग्रहों का असर खत्म होकर जीवन में सुख-समृदि्ध आती है। इसका कोई बड़ा विधि- विधान भी नहीं है। केवल मात्र भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग पर एक लोटा जल चढ़ाकर महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करने से सभी तरह की समस्याएं समाप्त हो जाती है।
सुबह घर से बाहर निकलते समय यदि हनुमानजी का दर्शन कर उन्हें प्रणाम करें तो भी सभी कार्य सिद्ध होते हैं। यदि संभव हो तो इंटरव्यू पर जाते समय हनुमानजी को लाल गुलाब का फूल अर्पण करते हुए निकलें।
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छोटे बच्चों में मिठाईयां, चॉकलेट बांटें। यदि ये भिखारियों के बच्चे हों तो बहुत ही बढिया रहेगा, आप उन्हें भोजन भी करवा सकते हैं। आपकी समस्या का तुरंत हल होगा।
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शनिवार की सुबह और शाम को पीपल के पेड़ की जड़ में देसी घी का दीपक जला कर अपनी मनोकामना कहें, तुरंत पूरी होगी।
कई बार घर में नेगेटिव एनर्जी अत्यधिक होने की वजह से भी काम बिगड़ जाते हैं। ऎसी स्थिति में घर में साफ-सफाई रखें और सुबह शाम गायत्री मंत्र का जाप करें। चाहें तो गायत्री मंत्र का जाप करने वाली मशीन घर में ले आएं तो उसे चलाकर छोड़ दें। इसके अतिरिक्त मंगलवार व शनिवार को सुन्दरकांड का पाठ करने से भी भाग्य की सभी बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

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