Tuesday, 2 December 2014

यह एक विचार करने लायक प्रश्न है कि हिंदू धर्म में किस हद तक मूर्ति पूजा स्वीकार्य है? मूर्ति क्याहै? एक चिह्न है। ईश्वर जो निराकार है, जिसका विवरण नहीं हो सकता, जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता, उस ईश्वर को देखने और समझने के लिए आपको एक माध्यम की आवश्यकता है। और उस माध्यम को आप मूर्ति कहते हैं।
भगवान उस मूर्ति में नहीं बसते, परन्तु एक मूर्ति आपको ईश्वर का मार्ग दिखाती है। देखो, आपके घर में आपके दादा या नाना जी की एक तस्वीर है दीवार पर। अब यदि कोई आपसे पूछे, 'आपके दादाजी कौनहैं?' आप उस तस्वीर की ओर संकेत करते हैं। क्या वह तस्वीर आपके दादाजी हैं? नहीं।
आपके दादाजी अब नहीं हैं, पर यदि कोई पूछे तो आप उस तस्वीर की ओर संकेत करके कहते हैं, 'ये हैं मेरे दादाजी।' तो एक तस्वीर, या मूर्ति एक माध्यम या प्रतीक है, इसीलिए उसे प्रतिमा कहा जाता है। फिर यह भी कि भारत में भगवान की हजारों भिन्न प्रतिमाएं हैं।
आप भगवान को किसी भी रूप में देख सकते हैं, जो भी भगवान आपको प्रिय हैं, आपके इष्ट देवता हैं। सारी किरणें उसी सूर्य से आती हैं, पर इनके सात भिन्न रंग होते हैं। इसी तरह, हमारे पंच देवता होते हैं, (ईश्वर के पांच रूप जो सब विधियों और धार्मिक कार्यों में पूजे जाते हैं, शिव, पार्वती, विष्णु, गणेश और सूर्यदेव।
इनके साथ सप्त मातृकाएं होती हैं, अर्थात दैवी शक्ति के सातस्वरूप। ये हैं, ब्रह्माणी, नारायणी, इन्द्राणी,महेश्वरी, वाराही, कुमारी और चामुंडा। इसी प्रकार भगवान एक है, पर हमारे पूर्वजों ने उन्हें भिन्न नाम और आकार दिए हैं। फिर एक प्रथा है भगवान की प्रतिमा को जाप द्वारा बनाना और भक्ति पूजा करना।
जो भी आकार जाप द्वारा बनता है, भक्ति के साथ, और एक सम्मान का स्थान पाता है, वही पूजनीय हो जाता है। देखिए, कोई भगवद्गीता या गुरु ग्रन्थ साहिब कोमात्र घर पर रख सकता है। परन्तु जब आप उनकी पूजा करते हैं, उनके सामने सर झुकाते हैं, उनको सेवा, भोग,अर्पित करते हैं, तो उसका अर्थ भिन्न होता है। और यदि आप उन्हें एक आकार या एक चेहरा दे देते हैं तो वह आप में और भी अधिक भक्ति जागृत करता है।
उदाहरण के रूप में, भगवान कृष्ण के मुख मंडल मात्र को देख कर मीराबाई उनके इतने गहरे प्रेम में पड़ गईं। चैतन्य महप्रभु चेतना की चरम स्थिति पा गए भगवान कृष्ण का वह रूप देख कर, जिसमें भगवान बांसुरी हाथ में लिए खड़े हैं, मोर पंख का मुकुट पहने और चमकीली पीली पोशाक में, एक पेड़ के नीचे।
जिस व्यक्ति को प्रतिमा की आवश्यकता है, वह उसे सीढ़ी के रूप में प्रयोग कर सकता है, ईश्वर तक पहुंचने के लिए। पर उस मूर्ति में ही मत अटक जाइए। सर्वदा याद रखिए कि भगवान आपके भीतर है। इसीलिए पुराने समय में मंदिर जाने की प्रथा भगवान की प्रतिमा देखने के बाद कुछ समय स्वयं उनके साथ बैठने की थी (अपने भीतर के ईश्वर को देखने के लिए)।
व्यक्ति को बिना कुछ क्षण बैठे मंदिर से नहीं आना चाहिए। पर आजकल लोग कुछ क्षण बैठते हैं, बस बैठने के नाम पर और फिर उठ कर चल देते हैं। यह स्वयं से छल करना है। पुराने समय में मूर्ति को अंधेरे में रखा जाता था, जिसे गर्भगृह कहते थे और आप तभी भगवान की मूर्ति का चेहरा देख सकते थे, जब उसे दिए की रोशनी से दिखाया जाए।
इसके पीछे का संदेश है कि आप को स्मरण रहे कि भगवान आपके मन की गहराइयों में बसते हैं। आपको उसे स्वज्ञान के माध्यम से देखना है। यह सच्चा सार है। प्राचीन समय में लोग प्रतिमाओं को बहुत सुंदरता से सजाते थे, ताकि आपका मन यहां-वहां न भटके और आप पूर्ण रूप से उस प्रतिमा से मोहित हो जाएं।
बौद्ध धर्म में भी इसी प्रकार से मन को वश में किया जाता है। भगवान बुद्ध की और बोधिसत्व की भी अतिसुन्दर प्रतिमाएं बनाते हैं। हीरे, पन्ना, स्वर्ण और चांदी के साथ। वे फल-फूल , अगरबत्ती, मिठाई इत्यादि मूर्ति के सामने रखते हैं, ताकि मन और सारी इंद्रियां ईश्वर पर केन्द्रित हो जाएं।
एक बार जब मन ठहर जाता है, वे आपको आंखें बंद कर ध्यान करने को कहते हैं। यह दूसरा कदम है। ध्यान में आप भगवान को अपने भीतर ही पाते हैं।

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