Thursday, 25 December 2014

हमारे यहां शब्दों को भी शस्त्र माना गया है। कुछ शब्द तो जीवनभर के घाव दे जाते हैं। कहते हैं मनुष्य के शरीर में जुबान एक ऐसा अंग है जिस पर चोट लग जाए तो सबसे जल्दी ठीक होती है और शरीर के इस अंग से यदि किसी को चोट पहुंचाई जाए तो जीवनभर उसके ठीक होने की संभावना नहीं होती। कहते हैं लात का तोड़ होता है, बात का नहीं। सुंदरकांड में समापन के नजदीक पहुंचकर समुद्र ने श्रीराम से एक ऐसी पंक्ति बोल दी, जिसे लेकर श्रीरामचरित मानस के शोधकर्ता खूब शोर मचाते हैं। यह चौपाई है - ढोल गंवार सूद्र पसु नारी। सकल ताडऩा के अधिकारी।। इसमें पांच लोगों की तुलना की गई है। यदि इसमें नारी नहीं होती तो तुलसीदासजी के विरुद्ध इतना उपद्रव नहीं होता।



कुछ लोगों ने तो उन्हें नारी विरोधी घोषित कर दिया। लोग अपने-अपने ढंग से इसका विश्लेषण करते हैं। मैंने सुना है एक बार एक पति ने इस चौपाई को सुना, फिर पत्नी से कहा, 'इसका अर्थ जानती हो न।' पत्नी ने तुरंत जवाब दिया, 'हां। इसमें चार बातें तुम्हारे लिए कही गई हैं और एक मेरे लिए।' इस प्रसंग को विनोद की दृष्टि से भी देख सकते हैं और गंभीरता से भी। तुलसी क्या चाहते थे इसका उत्तर तो उनके साथ ही चला गया। अब सिर्फ विद्वानों का चिंतन रह गया है। यह तो तय है कि तुलसी नारी विरोधी नहीं थे। वे कवि नहीं शुद्ध ऋषि थे। कवि केवल कल्पना से चलता है और ऋषि अपने भीतर अंतरभाव जगाता है।

निंदा रस को अपने भीतर प्रवेश न दें
कई लोगों का स्वभाव होता है कि जब तक वे दूसरों की आलोचना न कर लें, उन्हें चैन नहीं मिलता। उन्हें विपरीत टिप्पणी करने की आदत सी पड़ जाती है। वे पास होंगे तो उनकी नेगेटिविटी हमें प्रभावित करेगी। ताज्जुब नहीं कि हमें भी आलोचना करने की इच्छा होने लगे। निंदा में बड़ा रस आता है। दुनियादारी में ऐसे लोगों से बचना भी मुश्किल है। खासतौर पर जब वे हमसे बड़ी उम्र के या प्रभावशाली हों तो मर्यादा के कारण हम उन्हें रोक भी नहीं पाएंगे। ऐसे में पहली बात तो यह कि उनके शब्दों को अपने भीतर न आने दें। एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दें। दूसरा तरीका यह है कि यदि संभव हो तो तुरंत विषय को बदल देें। तीसरा तरीका यह होगा कि या तो उन्हें चलता कर दें या खुद चल दें। मगर किसी भी हालत में नकारात्मक विचारों को अपने भीतर प्रवेश न करने दें। एक काम और करते रहिए कि जब आलोचना चल रही हो तब भीतर आप दूसरा पक्ष सोचते हुए प्रशंसा में डूबने लगें।

किसी के मुंह से आलोचना के शब्द सुनते हुए अपने आपको काटना थोड़ा मुश्किल काम है। इसके लिए प्रतिदिन यह अभ्यास करें। कमर सीधी रखें, आंखें बंद करें और ऐसी कल्पना करिए कि आपकी सांसें सीढ़ी बन गई हैं और उन सीढिय़ों से भीतर उतर रहे हैं। जब सांस बाहर निकले तो बहुत धीरे-धीरे सोचते रहें कि आप सीढिय़ां चढ़कर बाहर आ रहे हैं। दो-तीन मिनट की यह क्रिया आपको स्वयं से जोडऩे में सहायक होगी और यहीं से आप गलत लोगों के गलत शब्दों से कट सकेंगे।

शिकायती चित्त त्यागें, लोकप्रिय होंगे
सभी के भीतर एक दबी-छिपी इच्छा होती है कि हम भी लोकप्रिय हो जाएं। फिर प्रदर्शन के इस जमाने में जो दिखता है वो बिकता है। बाजार का यही कानून है। अयोग्य और अनुपयोगी चीजें भी प्रदर्शन के बल पर योग्य और उपयोगी के आगे निकल गईं। लोकप्रिय होने में कोई बुराई नहीं है। यदि आप योग्य हैं और लोकप्रिय हैं तो यह भी एक तरह की समाजसेवा ही है। आज प्रबंधन के इस युग में आपको लोकप्रिय होने के लिए एक लिखित और स्पष्ट योजना बना लेनी चाहिए। वरना घुटन महसूस होने लगेगी। कुछ लोग ऊपर से तो कहते हैं कि वे ख्याति नहीं चाहते, लेकिन उनके भीतर का व्यक्तित्व पूछ-परख चाहता है, सम्मान की अपेक्षा रखता है।
यह भाव प्रबल होने पर लोकप्रिय होने की इच्छा बलवती हो जाती है।

लोकप्रिय होने के लिए अपनी याददाश्त तेज रखें, खासतौर पर लोगों के नाम और उनसे संबंधित तारीखों को याद रखें। बधाई और शोक संदेश देने में पारंगत और उदार रहें। अपने शिकायती चित्त को विराम दे दें। दूसरों की पसंद का पूरा लेखा-जोखा रखें। बहुत अच्छे श्रोता बन जाइए। आप लोगों को बोलने का जितना अधिक मौका देंगे, वक्त आने पर आप उतने ही ज्यादा सुने जाएंगे। बातों में अर्थ और माधुर्य दोनों रखें। अपनी आध्यात्मिक शक्ति को जो हर एक के भीतर होती है, दूसरों में स्थानांतरित करते रहें। इसके अलावा एक उपाय और है, थोड़ा अविश्वसनीय लगेगा, लेकिन किया जा सकता है। वह है अपने भीतर का अहंकार गिरा दें।

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