Friday, 14 November 2014

गणेश जी उन्नति, खुशहाली और मंगलकारी देवता हैं। कहते हैं जहां पर गणेश जी की नित पूजा अर्चना होती है वहां पर रिद्घि-सिद्घि और शुभ लाभ का वास होता है। ऐसे स्थान पर अमंलकारी घटनाएं और दुख दरिद्रता नहीं आती है। इसलिए गणेश जी की पूजा हर घर में होती है।

लोग अपने घरों में गणेश जी की मूर्ति और तस्वीर लगाकर रखते हैं। वास्तुविज्ञान भी यह मानता है कि जिस घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर होती हैं उस घर में रहने वाले लोगों की दिनानुदिन उन्नति होती है।

लेकिन उन्नति के चक्कर में गणेश जी के साथ हम लोग कुछ ऐसे काम कर बैठते हैं जो गलत हो जाता है और इससे लाभ भी नहीं मिलता।

वास्तुशास्त्री बताते हैं कि भरत में प्राचीनकाल से ही घर के मुख्यद्वार की चैखट के ऊपर सुख-शान्ति-समृद्धि के लिए गणेश जी की प्रतिमा लगाने की परंपरा रही है। कई स्थानों पर तो घर के मुख्यद्वार के ऊपर मध्य में श्री गणेश जी को विराजित कर उनके आस-पास सिन्दूर से उनकी दोनों पत्नियों के नाम “रिद्धि-सिद्धि” लिखने की भी परम्परा है, मान्यता है कि इससे घर में ज्ञान और धन की कभी कमी नहीं रहती।

इसलिए भारत के लगभग सभी मन्दिरों के मुख्यद्वार पर और प्राचीन हवेलियों में भी गणेश जी की मूर्ति केवल बाहर की ओर लगी हुई दिखाई देती है। पिछले दो-ढ़ाई दशकों से कुछ लोगों ने ऐसी बातें फैला रखी है कि गणेश जी की पीठ पर दरिद्रता का निवास होता है।

अतः मुख्यद्वार पर गणेश जी की मूर्ति लगाते समय एक जैसी दो मूर्ति लाकर एक मूर्ति मुख्यद्वार के बारह की ओर और एक मूर्ति मुख्यद्वार के अन्दर की ओर लगाना चाहिए ताकि गणेश की पीठ घर की ओर ना रहे।

यह भ्रान्ति कैसे और किसने फैलाई यह तो ज्ञात नहीं है, परन्तु गणेश जी की पीठ पर दरिद्र होता है यह धारणा पूर्णतः गलत और निराधार है, क्योंकि भारत में सदियों से घर के मुख्यद्वार के ऊपर केवल बाहर की ओर ही गणेश जी की मूर्ति लगाने की परम्परा चली आ रही है।

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