Saturday, 29 November 2014

मैं हमेशा कहता रहा हूं कि दुनिया भर के सात अरब लोग हैसियत और ताकत में जैसे भी हों, मानसिक शारीरिक और भावनात्मक रूप से एक ही तरह के हैं। चाहे राजा हो या रानी, भिखारी या धर्मगुरु सब एक ही तरह से जन्म लेते हैं। फर्क हम ही करते हैं। बड़े होकर भूलने लगते हैं कि हम सबका जन्म एक समान ही हुआ है।

फर्ज कीजिए कि एक बड़ी प्राकृतिक आपदा आए और हम उसमें से बच निकलें तो उस वक्त तमाम अंतरों को भूल जाएंगे। यह बात बच्चों से सीखनी चाहिए कि एक वे एक-दूसरे से भेदभाव किए बिना किस तरह हिल मिल कर खेलते हैं। हम दुनिया में तमाम तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। जैसे युद्ध और हिंसा।

ये समस्याएं हमारी अपनी ही रची हुई हैं। अगर मनुष्य की एकता और समानता पर जोर दे तो इनसे मुक्त रहकर हम ज्यादा खुश और मानवीय हो सकते हैं। जो भी कहें हमारी जिंदगी एक दूसरे के लगाव और संबंधों से आगे बढ़ती है। भारत का योगदान इस मामले में अनूठा रहा है। यहां मनुष्य को बेहतर बनाने वाले विचार, विज्ञान और विकास की अद्भुत पहल हुई है।

यहां की सभी प्राचीन धर्म परंपराएं मन की शांति और सुख समृद्धि पर जोर देती रही हैं। सांख्य और योग, न्याय, वैशेषिक मीमांसा, वेदांत और चार्वाक की विचार परंपराएं मनुष्य को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए समान रूप से यत्नशील रही है। चीन और मिस्र की प्राचीन विचार परंपरा ने भी इस दिशा में काम किया। लेकिन भारत ने उन सबकी तुलना में ज्यादा योगदान दिया।

लगभग सभी धर्म परंपराओं का अध्ययन किया। हालांकि मैं बहुत अच्छा विद्यार्थी नहीं रहा, लेकिन मैं भारत की प्राचीन धर्मपरंपरा और दर्शन से अभिभूत रहा हूं। आर्यदेव, भाव विवेक, दिंगनाग और धर्मकीर्ति ने उन परंपराओं का विश्लेषण किया और उनके अंतर को भी स्पष्ट किया। उनके लिखे हुए से स्पष्ट है कि बुद्ध का धर्म या बौद्ध दर्शन अपने समय की गैरबौद्ध पृष्ठभूमि पर खड़ा हुआ था।

दर्शन के साथ जीवन को सहज समृद्ध बनाने की दूसरी विधाओं में भी भारत का योगदान अपूर्व रहा। मुझसे एक बार प्रसिद्ध वैज्ञानिक राजा रमन्ना ने कहा था कि आज जिसे क्वांटम भौतिकी कहते हैं, उस विषय में भारत के प्राचीन विद्वानों ने बहुत आगे तक काम किया। आज विज्ञान जिन ऊंचाइयों को छू रहा है, भारत के मनीषी काफी पहले उन ऊंचाइयों से आगे जा चुके हैं।

मैं हमेशा कहता रहा हूं कि तिब्बत के लोग भारत को अपना गुरु मानते रहे हैं। हम अपने आप को भारत का चेला कहते हैं। लेकिन मैं सोचता हूं कि हम सिर्फ चेला ही नहीं हैं, भरोसेमंद शिष्य हैं। हमने उस ज्ञान को सुरक्षित रखने की चेष्टा� की है, जिसे हमारे गुरुओं ने हासिल किया था। मेरी आप सबसे प्रार्थना है कि उस प्राचीन ज्ञान पर ध्यान दें। इस तरह आप दुनिया को बेहतर बनाने के लिए काफी कुछ कर सकेंगे।

पंद्रहवी शताब्दी में तिब्बत के विद्वान कहते रहे हैं कि भारत की ओर से ज्ञान के रूप में एक रोशनी हमें प्राप्त होती रही है। वरना हम अंधेरे में ही भटकते रहते और यहां फैली बर्फ में ही गुम हो जाते। याद रखें, आदर प्राचीन भारतीयों का है, न कि उन भारतीयों का, जिनका बहुत कुछ पश्चिमीकरण हो गया है। पिछले तीस साल में मैं कई आधुनिक वैज्ञानिकों से मिला। उनसे भौतिकी मन जैविकी और मनोविज्ञान पर जानता समझता रहा।

उस तमाम जानकारी को भारतीय मनोविज्ञान से तुलना करने पर पाया कि आधुनिक मनोविज्ञान किंडरगार्डन की तरह है। इस ऊंचाई को पाने के लिए कुछ पूजा पाठ करने से या नए मंदिर बनाने से कुछ हासिल नहीं होना है। बल्कि गहराई से प्राच्यविद्या का अध्ययन करना जरूरी है। अगर हम ध्वंसात्मक भावनाओं को नियंत्रित करना सीख जाएं तो सामंजस्यपूर्ण विश्व की रचना कर सकेंगे।
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बौद्ध और हिंदू धर्म में कोई अंतर नहीं है। दोनों आध्यात्मिक दृष्टि से भाई की तरह है। दोनों में शील, शांति और प्रज्ञा अर्थात नैतिकता एकाग्रता और बुद्धि की पवित्रता पर समान रूप से जोर दिया है। दोनों में कहां फर्क है सिर्फ आत्मा और अनात्मा के सिद्धांत पर। कुछ साल पहले बंगलूरू में धर्मगुरुओं की एक बैठक हुई थी, एक महापुरुष ने उसका आयोजन किया था, जो बड़ी संख्या में गरीबों के लिए भोजन आवास का प्रबंध करता था।

उनसे दोनों धर्म की परंपराओं पर आत्मन और अऩात्मन के सिद्धांत पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि हिंदू संन्यासी के लिए आत्मन और दूसरे संन्यासी के लिए अनात्मन का सिद्धांत सही होगा। एक व्यक्ति ईश्वर को मानता है वह माने, जो नहीं मानता नहीं माने। यह उनका व्यक्तिगत मामला है।

लेकिन अनुशासन भाईचारा, सौहार्दता और करुणा में दोनों में कोई मतभेद नहीं है न। यही मूल बात है। सभी धर्म करुण अनुशासन के विश्वास पर जोर देते हैं। आएं निजी विश्वासों और मतभेदों को अपनी जगब रखते हुए एक सौहार्द्रपूर्ण और करुणाशील विश्व की रचना के लिए काम करें।

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