Monday, 17 November 2014

वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब हनुमानजी लंका पहुंचे तो उन्होंने देखा एक सुंदर भवन शोभा पा रहा है। यह भवन बहुत बड़ा है। उसकी लंबाई एक योजन और चौड़ाई आधे योजन यानी लंबाई लगभग 8 मील और चौड़ाई 4 मील की थी। राक्षस राज रावण का यह महल बहुत भव्य था।

सीता की खोज करते हुए जब हनुमान वहां पहुंचे तो रावण के इस सुंदर महल का अवलोकन करते हुए एक सुंदर गृह में जा पहुंचे जो राक्षस राज रावण का निजी निवास था। चार दांत व तीन दांत वाले हाथी उस भवन को चारों और से घेर कर खड़े थे। रावण का वह महल उसकी राक्षस जातियों की पत्नियों और हर कर लाई हुई राज कन्याओं से भरा था। रावण के उस महल की भव्यता अद्भुत थी। महल के अंदर अनेक गुप्त गृह और मंगल गृह बने हुए थे।

उस लंबे-चौड़े भवन में महल के बीच का भाग पुष्पक विमान था। जिसका निर्माण बहुत ही सुंदर ढंग से किया गया था। वह भवन मतवाले हाथियों से युक्त था। विश्वकर्मा ने बहुत ही दक्षता से उस गृह का निर्माण किया था। सोने और स्फटिक की खिड़कियां महल की खूबसूरती को चार-चांद लगा रही थी। उस भवन का फर्श मंहगे और बहुमूल्य मोतियों से बना था।

इसके बाद हनुमानजी को विशेष प्रकार की सुगंध का एहसास हुआ जो उनको अपनी तरफ खींच रही थी। हनुमानजी उस सुगंध की ओर चल पड़े। उन्होंने वहां एक बहुत बड़ी हवेली देखी। जो बहुत ही सुंदर थी। उसमें मणियों की सीढ़ियां बनी थी। मणियों और स्फटिक के बने खंबे थे।

उस हवेली में बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। स्वयं राक्षसराज रावण उसमें निवास करता था। हनुमानजी ने उस जगह को देखकर सोचा यह स्वर्ग लोक है। इन्द्र लोक है या देवलोक है। यह इंद्र पुर भी हो सकती है या ब्रह्मलोक भी हो सकता है। उन्हें उस महल की खूबसूरती को देखकर ये अनोखा भ्रम हुआ। वे अंतर ही नहीं कर पा रहे थे कि ये ऐश्वर्य ब्रह्मलोक का है या लंका का।
 
हनुमानजी ने कालीन पर बैठी हुई अनेक सुंदर स्त्रियों को देखा। वे स्त्रियां रंग-बिरंगे वस्त्र पहने और फूल मालाएं धारण किए हुए थीं। पवनकुमार ने उन सुंदरी युवतियों के चेहरे देखे, उनसे कमलो की सी सुगंध फैल रही थी। वे सारी स्त्रियां मदमस्त होकर बेहाल पड़ी थी। वे सभी रावण में इतनी आसक्त थी कि अपने पास सोई सौतो में भी उन्हें रावण दिखाई दे रहा था।

राजर्षियों, दैत्यों, गंधर्वों आदि की कन्याएं काम के वशीभूत होकर रावण की पत्नियां बन गई थी। उनमें से कुछ का रावण ने युद्ध की इच्छा से हरण किया था और कुछ खुद मोहित होकर उसकी सेवा में उपस्थित हो गई थी। कुछ आगे बढऩे पर हनुमानजी ने वीर राक्षसराज रावण को सोते देखा, वह सुंदर आभूषणों से विभूषित था। 

उसके कानों में कुंडल झिलमिला रहे थे। उसकी आंखें लाल थी। उसके वस्त्र सुनहरे थे। वह रात को स्त्रियों के साथ क्रीड़ा कर मदिरा पान कर आराम कर रहा था। उसका पलंग बहुमूल्य रत्नों से जड़ा था। उस महल में वैसे तो अनेक स्त्रियां सो रही थी, लेकिन शय्या एकांत में बिछी थी। उस शैय्या पर सोई एक रूपवती स्त्री को हनुमानजी ने देखा। वह मोती और मणियों से जड़े हुए आभूषण पहने थी। उसका रंग गोरा था। उसमें गज़ब का आकर्षण दिखाई दे रहा था। उसका नाम मंदोदरी था। वह अपने मनोहर रूप से सुशोभित हो रही थी। 

वह उस अंंत:पुर की स्वामिनी थी। हनुमानजी ने उसी को देखा। उसकी सुंदरता और आभूषणों को देखकर अनुमान लगाया कि यह सीताजी हैं। यह सोचकर वे आनंद से झूम उठे अपनी पूंछ को पटक कर चूमने लगे।

फिर उस समय वह विचार छोड़कर हनुमानजी अपनी स्वाभाविक स्थिति में आए और सीताजी के विषय में दूसरी तरह से सोचने लगे। उन्होंने सोचा सीताजी श्रीरामचंद्रजी से बिछुड़ गई हैं। वे इस दशा में न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं। न सिंगार कर सकती है। मदिरा का सेवन भी वे किसी प्रकार से भी नहीं कर सकती हैं। इसलिए यह सीता नहीं कोई दूसरी स्त्री है।

थोड़ा और आगे गए तो हनुमानजी ने रावण की पानभूमि यानी उसके महल की रसोई देखी जहां हिरण, भैसों व सूअरों का मांस रखा था। सोने के बड़े-बड़े बर्तनों में मोर, मुर्गा, सूअर, गेंडा, साही, हिरण का मांस भी देखा। वे अभी खाए नहीं गए थे। वहां कई तरह के भोजन सजे हुए पड़े थे। साथ ही, उनके साथ अनेक तरह की चटनियां थी। उस महल में कहीं पायल तो कहीं बाजूबंद पड़े थे। मदपान किए हुए पात्र यहां-वहां लुढ़क रहे थे।

पूरी पान भूमि को फूलों से सजाया गया था। उन सभी को देखकर महाकपि शंकित हो गए। उनके मन में ये संदेह हो गया कि इस तरह सोई हुई स्त्रियों को देखना अच्छा नहीं है। ये मेरे धर्म का विनाश कर देगा। फिर ये सोचने लगे कि प्रभु की आज्ञा के कारण यहां आया हूं और मेरे मन में कोई विकार नहीं है। मैंने साफ मन से रावण के अंत:पुर का अन्वेषण किया, यहां जानकी नहीं दिखाई देती हैं। उसके बाद हनुमानजी वहां से आगे बढ़े और दूसरी जगहों पर माता-सीता को खोजना आरंभ किया। 

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